कवर्धाछत्तीसगढ़

शिवाजी चौक की शान पर ‘पार्किंग’ का दाग! नियमों की धज्जियां, रसूखदारों के आगे सिस्टम लाचार?”

 

प्रदीप गुप्ता, कवर्धा। कवर्धा शहर की पहचान और गौरव का प्रतीक शिवाजी चौक आज अव्यवस्था और लापरवाही की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। लाखों रुपये खर्च कर तैयार किए गए इस भव्य चौक में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रेरणादायक प्रतिमा स्थापित की गई, ताकि शहर की सुंदरता बढ़े और आने वाली पीढ़ियां उनके त्याग और शौर्य से प्रेरणा लें। लेकिन हकीकत में यह चौक अब “पार्किंग अड्डा” बनकर रह गया है।

प्रदेश के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा और नगर पालिका अध्यक्ष चंद्रप्रकाश चन्द्रवंशी शहर को स्वच्छ और व्यवस्थित बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। कई बार अभियान चलाकर चौक पर पार्किंग रोकने की कोशिश हुई, फुटपाथ खाली कराए गए, लेकिन रसूखदार वाहन मालिकों पर इन कार्रवाइयों का कोई असर नहीं दिख रहा।
स्थिति यह है कि दिनभर चौक के चारों ओर बेतरतीब खड़ी गाड़ियां ट्रैफिक व्यवस्था को बाधित कर रही हैं। आम नागरिक परेशान हैं, लेकिन जिम्मेदार बेपरवाह। बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून सिर्फ आम जनता के लिए है? क्या प्रभावशाली लोगों के सामने प्रशासन और पुलिस कार्रवाई करने से पीछे हट रही है?


शहर को नई पहचान देने के उद्देश्य से बनाए गए इस ऐतिहासिक चौक की बदहाली अब लोगों में आक्रोश पैदा कर रही है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह चौक अपनी पहचान खो देगा।

छत्रपति शिवाजी महाराज केवल एक राजा नहीं, बल्कि साहस, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति की जीवंत मिसाल थे। 1630 में शिवनेरी किले में जन्मे शिवाजी महाराज ने कम उम्र में ही “हिंदवी स्वराज” का सपना देखा और उसे साकार कर दिखाया।
उन्होंने गुरिल्ला युद्ध नीति से शक्तिशाली दुश्मनों को परास्त किया और एक ऐसा शासन स्थापित किया, जहां न्याय, सुरक्षा और जनकल्याण सर्वोपरि था। महिलाओं के सम्मान और धार्मिक सहिष्णुता को उन्होंने अपने राज्य की नींव बनाया।
1674 में छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक के साथ उन्होंने स्वराज की मजबूत नींव रखी। उनका जीवन हर युवा को यह संदेश देता है कि दृढ़ संकल्प, साहस और सही नेतृत्व से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
शिवाजी चौक पर उनकी प्रतिमा स्थापित करने का उद्देश्य यही था कि शहर की नई पीढ़ी इस महान योद्धा से प्रेरणा ले और देश सेवा के मार्ग पर आगे बढ़े। लेकिन जिस तरह चौक की स्थिति बिगड़ती जा रही है, वह इस उद्देश्य को धूमिल करती नजर आ रही है। अब जरूरत है कि प्रशासन के साथ-साथ नागरिक भी जागरूक हों, तभी शिवाजी महाराज के आदर्शों का सही सम्मान हो पाएगा।

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